कोणार्क नाटक (समीक्षा )
१. कथावस्तु :
कोणार्क नाटक एक ऐतिहासिक नाटक है जो हमे उड़ीसा में स्थापित कोणार्क मंदिर के निर्माण के बारे में बताते है की किस प्रकार उस समय जो शिल्पी थे और जो मुख्य शिल्पी थे उन्हें कोणार्क मंदिर के शिखर पर गुम्बद स्थापित करने में कितनी मुश्किल आ रही थी और साथ ही साथ उसमे में यह भी दिखाया है उस समय राजा नरेश नरसिंघ देव का राज्य था और उनके मंत्री जो महामात्य चालुक्य थे उन्होंने किस प्रकार प्रजा के साथ अन्याय किया था और प्रजा किस प्रकार दुखी थी उनसे।
नाटक को ३ अंको में विभाजित किया गया था और नाटक का विकास देखा जाये तो हम देखते है की नाटक की शुरआत होती है जब महा शिल्पी अन्य शिल्पियों से अपनी चिंता प्रकट कर रहे होते है की मंदिर के शिखर पर गुम्बद का निर्माण हो भी पायेगा क्या उनका यह सपना कोणार्क को पूरा करने का सफल हो भी पायेगा वह इस चिंता में बैठे होते है
इसके बाद राजीव जब विशु ( महा शिल्पी ) को बताता है की राज्य में एक अलप उम्र का शिल्पी आया है वह बहुत ही प्रतिभाशाली है तब विशु राजीव को कहता है की वह उस शिल्पी से मिलना चाहता है तो राजीव उनकी मुलाकात धर्मपद से करवाते है और विशु धर्मपद से मिलने पर उसके नए विचारो को देखर बहुत प्रभावित होते है
इसके बाद महामात्य चालुक्य आते है और वह महा शिल्पी को धमकी देकर जाते है की अगर १ सप्ताह में इस मंदिर का निर्माण ना हुआ तो वह सभी शिल्पियों के हाथ काट देंगे। तब वह सभी बहुत ज्यादा चिंतित हो जाते है परन्तु धर्मपद ही विशु को सही तकनीक बता कर उनकी शिखर पर गुम्बद को सथपित करने में उनकी मदद करता है और बदले में धर्मपद बोलता है की उनको एक दिन के लिए उसे महाशिल्पी का अधिकार दे दे। विशु समझौता स्वीकार करता है
जब मंदिर का उद्घाटन होता है तब राजा के समक्ष विशु राजा को बताता है कि किस प्रकार धर्मपद ने उनकी मदद की गुम्बद को स्थापित करने में नहीं तो कई शिल्पियों के हाथ काट दिए जाते। इस बीच राजा को पता चलता है कि किस प्रकार उनके पीछे से चालुक्य ने प्रजा को तंग करके रखा है और वह सबसे वादा करते है की वह चालुक्य से बात करेंगे। इतने में पता चलता है की चालुक्य अपनी सेना के साथ मंदिर को ३ तरफ से आक्रमण करने लगे थे तब धर्मपद सबको विश्वास जगाता है की हम मिलकर इनका सामना करेंगे। वह सब मिलकर तयारी करते है की किस प्रकार चालुक्य की सेना का सामना किया जायेगा।
अंतिम अंक में पता चलता है की धर्मपद विशु का ही पुत्र है क्योंकी वह अपनी प्रेमिका चंद्रलेखा से भागकर यहाँ आकर रहना शुरू कर देता है और मूर्ति बनाना शुरू कर देता है और जब वह धर्मपद के गले में माला देखते है तोह पाते है यह तोह वही माला है जोह उन्हों नह चंद्रलेखा को दी थी। और दूसरी तरफ राजा रात को मंदिर से अपने मंत्री महेंद्र के साथ निकल जाते है की वह सीना लेकर चालुक्य पर पीछे से आक्रमण करेंगे। इतने में ही चालुक्य अपनी सेना के साथ मंदिर में अंदर आ जाते है और सभी शिल्पी उनका सामने करने की हालत में नहीं होते और धर्मपद भी घायल होता है तो विशु अपने पुत्र की जान बचाने के लिए शिखर पर चढ़ कर गुम्बद की चुम्बक को तोड़ते है जिससे देव मूर्ति निचे गिरती है और चालुक्य और उसकी सेना और विशु उसके निचे आकर उनकी मौत हो जाती है और विशु का सपना भी टूट जाता है।
२. पात्र एवं चरित्र चित्रण :
कोणार्क नाटक में हम देख सकते है की पात्रो की संखया बहुत सीमित है नाटक में कुल ७- ८ पात्र है जिनमे से मुख्य पात्र के रूप में हम देख सकते है कि महाशिल्पी विशु और धर्मपद , चालुक्य हमारे सामने आते है और गौण पात्र के रूप में भी हमारे सामने नरसिंघ देव, शिल्पी राजीव,मुकुंद , महेन्दर , सेना , आदि है मुख्य पात्रो में भी अगर हम बात करे तो विशु , धर्मपद हमारे सामने सकारात्मक पात्र है क्यूंकि अगर हम महाशिल्पी विशु की बात करे तो उनका चरित्र बहुत ही अच्छा है जैसे हम उनके चरित्र में देख सकते है की वह स्थितियों में सामंजस्य बिठाने वाले थे और उच्च विचारो वाले व्यक्ति थे और वह सहृदय वाले थे
वही दूसरी तरफ हम विशु का चरित्र देखे थे तो वह एक अच्छे वक्ता थे और निडर थे और मुशील समय में दूसरी की मदद करने वाले थे और वह नवीन विचारो वाले थे और एक अचे कारीगर के रूप में हमारे सामने आता है
चौलक्य का चरित्र अगर हम देखे तो पाते है की वह नकारात्मक रूप से हमारे सामने आते है की वह एक चतुर और चालक किस्म के आदमी थे और कठोर हृदय वाले विश्वासघाती और लालची थे और उनमे बहुत ज्यादा अहंकार था और वह किसी भी इंसान पर विश्वास नहीं करते थे
३. देशकाल और वातावरण
कोणार्क नाटक में अगर हम देशकाल और वातावरण की बात करे तो हम देख सकते है की कोणार्क मंदिर में देशकाल और वातावरण एक दम समय, स्थान और परिवेश के अनुकूल दिखाया है कोणार्क नाटक में हम देख सकते है की यह नाटक १२ इ १३ शताब्दी का है और अगर हम स्थान की बात करे तो हम पाते है की यह उड़ीसा में स्थित सूर्ये देव के मंदिर निर्माण कोणार्क की कहानी है जिसके कारण हम देख सकते है वह पर खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग किया गया है और परिवेश भी बिलकुल स्थान के अनुकूल है और राज्य की स्थिति ,वहा की संस्कृति यह सब उस समय के अनकूल ही दिखाई गयी है
४. संवाद योजना :
कोणार्क नाटक के संवाद की बात करे तो वह बिलकुल स्थिति के अनुकूल है और कोणार्क नाटक के संवाद छोटे और प्रभावी संवाद है जिससे नाटक को गतिशीलता देखने को मिलती है और वह सरल रूप से पात्रो के समक्ष रखे गए है जिससे दर्शको के सामने पात्रो का चरित्र भी सहज रूप से सामने आता है कोणार्क नाटक के संवादों में हमे सरलता और सहजता देखने को भी मिलती है उदाहरण के लिए देखे तो विशु के संवादों से हमे उसके उच्च विचार देखने को मिलते है
५. भाषा शैली :
कोणार्क नाटक की भाषा शैली की बात करे तो नाटककार ने संवादात्मक शैली का प्रयोग के साथ साथ वर्णात्मक शैली का प्रयोग भी किया है और कोणार्क नाटक में भाषा सरल , सहज और स्वाभाविक भाषा है और भाषा बिलकुल व्यहवारिक भाषा है जिसमे ज्यादा कलिष्टता का प्रयोग नहीं किया गया है इसमें स्थान के अनुकूल भाषा का ही प्रयोग किया गया है जैसे खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग और शब्द संस्कृत और तत्सम शब्दों का भी प्रयोग किया गया है
६. अभिनेयता / मंचन :
कोणार्क नाटक में यदि हम मंचन की बात करे तो यह एक सफल नाटक के रूप में हमारे सामने आता है क्योंकि इसमें जो रंग निर्देश का प्रयोग किया है वह बिलकुल पाठकवर्ग को या फिर दर्शको को हर दृश्ये से पहले पता चल जाता है की दृश्ये में किस किस सामग्री का प्रयोग किया गया है इसके साथ साथ कोणार्क नाटक के मंचन में उन्होंने साधारण साज सज्जा का प्रयोग किया है और वही दृश्ये दिखाए है जो दिखने लायक है और इसमें उन्होंने प्राकृतिक दृश्ये का कम प्रयोग किया है और हर दृश्ये में मंचन के नियमो का पालन किया है इसके साथ साथ नाटक में उन्हों ने सीमित पत्रों का प्रयोग किया है जिससे मंच पर वे हर दृश्ये कोअच्छे से मंचन कर पाए है
७. उद्देश्य :
कोणार्क नाटक के माध्यम से नाटककार हमे यही दिखाना चाहता है की किस प्रकार एक कलाकार को उसके स्वाभिमान की रक्षा करने की और अत्याचारों का विरोध करने की प्रेरणा भी देता है इस नाटक से माध्यम से नाटककार ने दिखाया है की किस प्रकार एक कलाकार के मन में उसके कला को लेकर कितना प्रेम होता है जिससे वह अपने सपनो को पूरा करने के लिए कड़ी से कड़ी कोशिश करता है और कोणार्क नाटक में हम देख सकते है की नाटककार ने महाशिल्पी और अन्य शिल्पी के संघर्ष और द्वन्द को पूरी तरह से उभारता है और हमे इससे यह भी सीखने को मिलता है की जब हमारे साथ अन्याय होता है तो हमे उसका हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए ना ही चुप रहकर उससे देखते रहना चाहिए।
अंत में हम कह सकते है की कोणार्क नाटक जगदीशचंद्र द्वारा स्वतंत्रता के बाद लिखा गया यह नाटक एक सफल कृति है जिसमे उन्होंने इतिहास के बारे में दिखाया है और अपनी उद्देश्य को पाठक वर्ग के सामने रखने में सफल हुए है

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